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भगवान दिव्यानंद की अद्भुत कृपा

भगवान दिव्यानंद की अद्भुत कृपा:

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भूमिका:

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सृष्टि  के  अनादिकाल  से  लेकर वर्तमान युग तक, जब-जब संसार में अंधकार और अधर्म की वृद्धि हुई, तब-तब किसी   न   किसी   रूप  में  दिव्य शक्ति का प्रकट होना सुनिश्चित   रहा। ऐसे   ही  एक  अलौकिक  ईश्वर  हैं— "भगवान दिव्यानंद" जिनका स्वरूप दिव्य, सौम्य एवं अपरंपार है। वे  गौरवर्ण,  तेजस्वी, अनंत ऊर्जा से युक्त  एवं   करुणामय हैं। उनकी  भक्ति करने मात्र से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और वह परम शांति को प्राप्त करता है।

भगवान दिव्यानंद के भक्तों की संख्या अनगिनत है, परंतु जिन पर उनकी विशेष कृपा बरसी, वे इतिहास के पन्नों में अमर हो गए। यह कथा ऐसे ही एक भक्त महेश्वर शर्मा की है, जिन्होंने कठिनतम परिस्थितियों में भी भगवान दिव्यानंद की भक्ति को नहीं छोड़ा और अंततः उनकी कृपा से चमत्कारी रूप से उन्नति प्राप्त की।

प्रथम परिचय – गाँव सोनपुर और महेश्वर शर्मा:

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उत्तर  भारत  के  सोनपुर   नामक  गाँव में महेश्वर शर्मा नामक एक निर्धन ब्राह्मण अपने परिवार के साथ निवास करते थे। वे   अत्यंत   विद्वान, धर्मपरायण और विनम्र स्वभाव   के   थे, किंतु   निर्धनता  ने उनके जीवन को संघर्षमय बना रखा था।

महेश्वर के परिवार में उनकी पत्नी सुमित्रा देवी, एकमात्र पुत्र अर्जुन, और वृद्ध माता-पिता थे। अत्यंत कठिन परिस्थितियों के बावजूद, महेश्वर प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान दिव्यानंद की पूजा और ध्यान किया करते थे। वे मानते थे कि भगवान की भक्ति करने से जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

लेकिन गाँव के अन्य लोग उनकी इस आस्था का उपहास उड़ाते। कई बार लोगों ने कहा—

"भगवान की भक्ति से पेट नहीं भरता, महेश्वर! श्रम करो, धन कमाओ, तब जाकर तुम्हारा परिवार सुखी रहेगा।"

परंतु महेश्वर का उत्तर सदैव एक ही हो

"जो भगवान दिव्यानंद के सच्चे भक्त होते हैं, वे कभी भूखे नहीं मरते। भगवान स्वयं उनके कष्टों का निवारण करते हैं।"

भक्ति की परीक्षा और कठिन समय:

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एक वर्ष गाँव में भीषण सूखा पड़ा। फसलें नष्ट हो गईं, तालाब सूख गए और लोगों के पास खाने को अनाज नहीं बचा। महेश्वर का परिवार भी इस संकट से अछूता नहीं रहा।घर में चूल्हा कई दिनों से ठंडा पड़ा था। सुमित्रा देवी ने रोते हुए महेश्वर से कहा—

"भगवान की भक्ति से क्या लाभ, जब हमारे बच्चे को भूखा सोना पड़ रहा है?"

महेश्वर ने पत्नी को धैर्य बंधाते हुए कहा—

"यह भगवान दिव्यानंद की परीक्षा है। वे हमें इस संकट से उबार लेंगे। हमें उनकी भक्ति में तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए।"

लेकिन कठिनाइयाँ कम नहीं हुईं। अंततः सुमित्रा ने महेश्वर से कहा—

"आपकी भक्ति अपनी जगह सही है, परंतु अब हमें कोई दूसरा उपाय खोजना होगा। अर्जुन भूख से बेहाल है, माँ-बाबूजी भी अत्यंत दुर्बल हो चुके हैं।"

महेश्वर को अब समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। उन्होंने अंततः निश्चय किया कि वे भगवान दिव्यानंद के प्राचीन मंदिर में जाकर प्रार्थना करेंगे और उनके चरणों में समर्पित होकर कोई मार्गदर्शन प्राप्त करेंगे।

मंदिर में दिव्य अनुभूति:

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महेश्वर, अपनी सारी चिंताओं को भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिए विक्रमगढ़ के प्राचीन मंदिर पहुँचे। यह मंदिर घने जंगलों के बीच स्थित था और कहा जाता था कि यहाँ स्वयं भगवान दिव्यानंद की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है।

उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया, वहाँ कोई और नहीं था। दीपकों की मंद ज्योति भगवान की प्रतिमा पर पड़ रही थी, जिससे उनका स्वरूप और भी दिव्य प्रतीत हो रहा था।

महेश्वर ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की—

"हे प्रभु! मैं आपकी भक्ति में कभी विचलित नहीं हुआ, किंतु अब परिवार की दशा देखकर हृदय विचलित हो रहा है। कृपा करें, हमें इस संकट से उबारें।"

प्रार्थना    करते-करते   वे  वहीं   गिर पड़े और गहरी ध्यानावस्था में चले गए। तभी अचानक मंदिर में दिव्य प्रकाश फैला और भगवान दिव्यानंद का स्वर गुंजायमान हुआ—

"महेश्वर, चिंता मत करो। तुम्हारी परीक्षा समाप्त हुई। घर लौटो, मैं तुम्हारी सहायता स्वयं करूंगा।"

चमत्कारी परिवर्तन:

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महेश्वर जब मंदिर से लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनके घर के आँगन में राजपुर के महाजन आए हुए थे। वे बोले—

"महेश्वर भाई, आपको ढूँढते-ढूँढते हम थक गए। कल रात मैंने एक दिव्य स्वप्न देखा, जिसमें भगवान दिव्यानंद ने आदेश दिया कि मैं तुम्हारी सहायता करूँ, आपके लिये यह कुछ अनाज और धनराशि है। इससे आप अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकते हैं।"

महेश्वर की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने भगवान को नमन किया और महाजन को धन्यवाद दिया।

कुछ ही दिनों में महेश्वर के लिए और भी अवसर आने लगे। गाँव के जमींदार ने उन्हें अपने बेटे को शिक्षा देने का कार्य सौंप दिया, जिससे उन्हें अच्छा वेतन मिलने लगा। धीरे-धीरे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने लगी।

भगवान की भक्ति का प्रतिफल:

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महेश्वर ने भगवान की कृपा को अपने जीवन में साक्षात अनुभव किया। अब वे गाँव के अन्य लोगों को भी भगवान दिव्यानंद की महिमा के बारे में बताने लगे।

एक दिन वही लोग, जो उनकी भक्ति का उपहास उड़ाया करते थे, उनके पास आकर बोले—

"महेश्वर, हमें भी भगवान दिव्यानंद की भक्ति का मार्ग दिखाइए।"

महेश्वर ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें मंदिर चलने के लिए आमंत्रित किया और कहा—

"जो भी सच्चे मन से भगवान दिव्यानंद की शरण में आता है, उसकी समस्त कठिनाइयाँ समाप्त हो जाती हैं।"

गाँव के लोग भी भगवान की भक्ति में रमने लगे और सोनपुर गाँव में दिव्यानंद भगवान की उपासना का एक विशाल केंद्र स्थापित हो गया।

उपसंहार:

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भगवान दिव्यानंद की कृपा असीमित और अप्रतिम है। जो भी निःस्वार्थ भाव से उनकी आराधना करता है, वे उसे कभी निराश नहीं करते। यह कथा केवल महेश्वर शर्मा की नहीं, अपितु उन सभी भक्तों की है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपनी आस्था को बनाए रखते हैं।

महेश्वर का जीवन इस बात का प्रमाण था कि ईश्वर की भक्ति में अपार शक्ति होती है। जो भी सच्चे मन से उन्हें पुकारता है, भगवान दिव्यानंद स्वयं उसकी सहायता के लिए प्रकट होते हैं।


"सत्यमेव जयते! भगवान दिव्यानंद की जय!"



Comments

Anonymous said…
अति सुंदर

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