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जुनून, तक़दीर और ईश्वरीय शक्ति: एक अनकही दास्तान:भाग (2)

 पंचम अध्याय: अनदेखी शक्तियाँ और नियति का आघात


रात्रि के गहन अंधकार में, हवेली के मुख्य द्वार से एक काली गाड़ी तीव्र गति से निकली। इंजन की गुर्राहट और टायरों की रगड़ती हुई आवाज़ ने श्मशानी सन्नाटे को चीर दिया। गाड़ी के भीतर युवराज बैठा था—उसकी आँखों में रक्तिम उन्माद, अधरों पर एक विकृत मुस्कान, और हृदय में एक दैत्य-सा संकल्प। उसके निकट ही ख्वाहिश थी—डरी, सिमटी, किंतु अडिग।


युवराज की पकड़ लोहे के पंजों की भांति कठोर थी। ख्वाहिश जितना विरोध करती, उतना ही उसकी देह पर उसकी शक्ति का बोझ बढ़ता जाता। गाड़ी के भीतर दमघोंटू सन्नाटा व्याप्त था, केवल युवराज के अवचेतन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों की भयावह गूंज ही वहां उपस्थित थी।


"तुम मेरी हो, ख्वाहिश," युवराज की आवाज़ में एक सम्मोहक, किंतु भयावह दृढ़ता थी।


ख्वाहिश ने अपनी आँखें मूंद लीं। मन-ही-मन ईश्वर का स्मरण किया। किंतु नियति के इस क्रूर नाटक में अब देवताओं की भूमिका भी धुंधली प्रतीत हो रही थी।


गाड़ी कच्चे रास्ते पर मुड़ चुकी थी। पेड़ों की घनी शाखाएँ आकाश को ढँक चुकी थीं, मानो स्वयं प्रकृति ने इस पथ को पृथ्वी से काट दिया हो। हवा की सनसनाहट अब एक विचित्र, रहस्यमयी गूँज में परिवर्तित हो रही थी। आसपास फैले घने वृक्ष, उनके विकृत आकार, जंगली झाड़ियों में सरसराहट करते जीव—सब कुछ किसी अज्ञात भय को जन्म दे रहे थे।


यह स्थान वीरान था, उपेक्षित था। और इस वीराने में कुछ था—कुछ ऐसा, जो मात्र भौतिक नहीं था।


युवराज ने गाड़ी रोकी। वह उतरा और ख्वाहिश को जबरन बाहर खींच लिया।


"अब कोई तुम्हें मुझसे बचाने नहीं आएगा," उसने व्यंग्यपूर्वक कहा, "न तुम्हारे माता-पिता, न तुम्हारा ईश्वर!"


लेकिन उस क्षण, वातावरण में एक विचित्र परिवर्तन हुआ। ठंडी हवा अचानक गर्म हो गई। वृक्षों के पत्ते बिन किसी कारण कांपने लगे। कहीं दूर किसी पशु की चीख़ हवा में घुल गई।


ख्वाहिश ने धीरे-से अपने चारों ओर दृष्टि घुमाई।


"यह स्थान... यह स्थान शुद्ध नहीं है," उसके होठों से अनायास ही शब्द फिसल पड़े।


युवराज हँसा। "डर लग रहा है, ख्वाहिश?"


परंतु इस बार उसकी हँसी में वह ठसक नहीं थी। वह जितना आगे बढ़ता, उतना ही उसके शरीर में एक असहनीय भार बढ़ता जाता। मन में एक अजीब-सी घुटन थी। हृदय किसी अदृश्य भय से आकुल होने लगा था।


"यह कैसी अनुभूति है?"


युवराज ने अपना सिर झटका। वह भय को अस्वीकार नहीं कर सकता था। वह शक्ति का स्वामी था, भाग्य का निर्माता था—फिर यह विचित्र शक्ति कैसी, जो उसके भीतर ही भीतर उसे दुर्बल कर रही थी?


ख्वाहिश ने देखा, उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। उसकी आँखें, जो अभी तक अधिकार और उन्माद से भरी थीं, अब संशय और बेचैनी में डूब रही थीं।


तभी... एक फुसफुसाहट।


नरम, मगर तीक्ष्ण।


"यहाँ मत आओ..."


युवराज के कानों में किसी ने यह शब्द कहे थे। स्पष्ट, किंतु अदृश्य। वह झटके से पीछे मुड़ा। कोई नहीं था।


"ख्वाहिश, तुमने कुछ कहा?"


"मैंने नहीं... लेकिन तुमने सुना, है न?"


युवराज ने खुद को संयत करने का प्रयास किया।


"बकवास मत करो! यह सब तुम्हारी कल्पना है।"


किन्तु तभी...


गाड़ी के अंदर बैठे ड्राइवर की एक भयानक चीख़ वातावरण को कंपा गई।


युवराज और ख्वाहिश दोनों ही स्तब्ध रह गए। युवराज ने मुड़कर देखा—ड्राइवर अब अपनी सीट पर नहीं था।


"राजा बाबू!"


युवराज ने अपनी जेब से टॉर्च निकाली और गाड़ी के पास पहुँचा।


गाड़ी का दरवाज़ा खुला पड़ा था, और ज़मीन पर गहरी खरोंचों के निशान थे। पत्तों पर ताज़ा खून की बूंदें टपक रही थीं।


ड्राइवर कहीं नहीं था।


ख्वाहिश ने सिहरकर चारों ओर देखा।


"हमें यहाँ से जाना चाहिए..." उसकी आवाज़ काँप रही थी।


किन्तु युवराज, जो अभी तक स्वयं को इस भय से परे मान रहा था, अब भीतर ही भीतर आतंक का शिकार हो रहा था।


वह पीछे हटने लगा, पर उसके पैर कांप रहे थे। हृदय की धड़कनें अनियंत्रित हो रही थीं।


"यह... यह क्या हो रहा है?"


और तभी, वृक्षों के पीछे से एक आकृति प्रकट हुई।


न अंधकार में पूर्णतः विलीन, न प्रकाश में पूरी तरह प्रकट।


उसकी आँखें जलती हुई प्रतीत हो रही थीं।


युवराज को पहली बार अपने अस्तित्व पर संदेह हुआ।


ख्वाहिश, जो अब तक भयभीत थी, इस अनदेखी शक्ति के सम्मुख अनायास ही अपने भीतर एक आत्मबल अनुभव करने लगी।


"तुमने अपनी ताक़त पर इतना गर्व किया था, युवराज," वह बोली, "अब तुम्हारे सम्मुख कोई खड़ा है, जो तुमसे अधिक शक्तिशाली है।"


युवराज ने कांपते हुए अपनी आवाज़ को कठोर करने का प्रयास किया।


"कौन है? कौन है वहाँ?"


परंतु उत्तर में केवल एक मर्मांतक हँसी गूँजी।


और फिर—संपूर्ण अंधकार।


अब निर्णय नियति के हाथ में था।


(क्रमशः...)


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