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श्री दिव्यानंद चालीसा एवं आरती।

       ॥ श्री दिव्यानंद चालीसा ॥

दोहा:

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जय जय जय दिव्यानंद प्रभु, जग में तेरा नाद।

सकल सृष्टि के पालनकर्ता, तू ही सत्य विग्रह साध।।

चौपाई:

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जय दिव्यानंद कृपालु दयाला।

सृष्टि सृजन के अद्भुत भाला।।

गौरवर्ण तन अरु मृदु मुस्काना।

नभ सम तेज, दीप सम आना।।

चार भुजाएँ शोभा धारी।

चक्र, त्रिशूल, गदा, धनु भारी।।

सृष्टि कर्ता तू विधि विधाता।

तू ही पालन, तू संहाता।।

सूर्य, चंद्र, जल औ’ पवन।

तेरी माया से सब गति पवन।।

तीन लोक चौदह भुवन सारा।

तेरी शक्ति से हो उजियारा।।

आदि पुरुष को तूने रचाया।

आदिशक्ति से जगत बसाया।।

सप्त ऋषी को ज्ञान दिया तब।

धरती पर जीवन का सबलब।।

त्रेता, द्वापर और सतयुग में।

तेरी भक्ति रही जन-जन में।।

पर कलयुग में भूले प्राणी।

भौतिक मोह में तज दी वाणी।।

'वत्स' संत को स्वप्न दिखाया।

तेरी महिमा का ज्ञान कराया।।

"दिव्यानंद" का मंत्र सुनाया।

जिसने जपा, सकल सुख पाया।।

रामदीन के खेत हरे भये।

विनोद के व्यापार फले फूले।।

अनिता की विद्या का गुण गाया।

दिव्यानंद का यश फैलाया।।

पर जिसने किया तेरा अपमान।

उसके घर छाए दुख के गान।।

रमेश हुआ दरिद्र बेचारा।

शंकर ने खोया सब सहारा।।

तेरी माया अपरंपार है।

हर संकट का तू ही सार है।।

जो तुझे ध्यावे मन लगाकर।

सुख-समृद्धि पाए जग साकार।।

भक्त जो तेरा ध्यान लगाए।

मनवांछित फल वह जन पाए।।

तेरी कृपा से दरिद्र मिटावे।

संकट टलै, घर वैभव पावे।।

दीन-दुखी जो तुझको ध्यावें।

तेरी कृपा उन्हें सुख पावें।।

माता-पिता की सेवा करके।

तेरा भक्त सुखों में तरके।।

बालक, वृद्ध, नर-नारी सारे।

तेरी भक्ति में लय हो प्यारे।।

तेरा ध्यान जो प्रेम से लावे।

उसका घर सुख-शांति पावे।।

जो तेरे गुणगान को गाए।

संतति सुख हर घर में छाए।।

तेरी महिमा जिसने जानी।

उसके जीवन में दुख न आनी।।

शक्ति अनंत, अपार तुम्हारी।

तेरे आगे रुके न विपदा भारी।।

तेरी भक्ति जो अंतर लाए।

हर संकट वह सहज मिटाए।।

दिव्यानंद दयालु कृपाधारी।

भक्तन के तू संकट हारी।।

जो तुझे सुमिरे दिन-राती।

हर बंधन से वह जन छूटे।।

तेरा तेज समर्पण पावे।

ब्रह्मांड तेरी महिमा गावै।।

जो तुझे प्रेम भाव से भजता।

कभी न जीवन संकट सजता।।

तेरी भक्ति में शक्ति अपारा।

तेरी कृपा करे दुख निवारा।।

जो तेरे स्वरूप को पहचाने।

तेरा दास कष्ट न जाने।।

भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सागर।

तेरी शरण में मिटे अंधकार।।

दिव्यानंद करुणामय दाता।

तेरा नाम बने सुख विधाता।।

जो तेरी शरण लग जाए।

हर जनम सफल वह पाए।।

तेरी महिमा गाए जो कोई।

उसका कल्याण सदा ही होई।।

दोहा:

दिव्यानंद बलवान प्रभु, संकट हरन सुजान।

तेरा नाम जपे जो कोई, हो भवसागर पार।।

॥ श्री दिव्यानंद आरती ॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद।

सकल सृष्टि के पालनकर्ता, तेरा अद्भुत छंद॥

गौर-वर्ण तव रूप निराला, मणि-सदृश तेरी माला।

तेरी महिमा का क्या कहना, तेरे गुण हैं बेमिसाला॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

चरण कमल तेरे अनमोल हैं, दुख हरता जो शरण गहें।

जो भी तेरे ध्यान में रमता, पाता सुख के दीप सजे॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

त्रिशूल, चक्र, गदा, धनुषधारी, सब संकट के विनाशकारी।

तेरी कृपा जो जन पर होती, विपदा मिटे, हो सुख भारी॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

सप्त ऋषियों को तूने भेजा, सत्य धर्म का जग में सन्देशा।

तेरी माया अपरम्पार है, करुणा तेरी अपार है॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

कलियुग में जब भक्ति हारी, संत वत्स को दी सवारी।

स्वप्न में दर्शन दे प्रकटे, सत्य का सन्देश उजारी॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

तेरी कृपा रामदीन ने पाई, खेतों में हरियाली छाई।

विनोद के व्यापार में आया लाभ, तेरा नाम जिसने अपनाया॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

अनिता के जीवन में छाया प्रकाश, तेरा नाम दिलाए उल्लास।

जिसने भक्ति से तुझे पुकारा, जीवन में हर संकट हारा॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

जिसने किया तेरा अपमान, उसके जीवन में दुख ही जान।

रमेश का व्यापार हुआ नष्ट, शंकर का सम्मान हुआ भ्रष्ट॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

तेरा नाम अमृत से प्यारा, तेरी शरण में सुख अपारा।

जो भी तेरे नाम को ध्यावे, दरिद्रता का संताप मिटावे॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥

तेरी कृपा से जीवन संवरे, सदा तेरा नाम जन-जन उचारे।

जो तेरा गुणगान करेगा, भवसागर से पार उतरेगा॥

ॐ जय दिव्यानंद प्रभु, जय जय दिव्यानंद॥





Comments

Anonymous said…
सुपर

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