सप्तम अध्याय: मृत्यु के समक्ष
अंधकार और भी सघन हो गया था। श्मशान की शीतल हवा ने वातावरण को भयावह बना दिया था। चारों ओर रात की निस्तब्धता थी, परंतु उस नीरवता के भीतर एक अजीब-सी ध्वनि स्पंदित हो रही थी—जैसे असंख्य आत्माएँ किसी अज्ञात भय से कराह रही हों।
युवराज सिंहानिया अब भी ज़मीन पर गिरा हुआ था। उसकी आँखों में एक भय था, जिसे उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। ख्वाहिश भी स्तब्ध खड़ी थी। उस अघोरी की उपस्थिति अभी भी वहां विद्यमान थी, किंतु अब वह अकेला नहीं था। उसके चारों ओर असंख्य छायाएँ प्रकट हो रही थीं—मृत आत्माओं की छायाएँ।
अचानक, अघोरी ने अपनी आँखें खोलीं और कठोर स्वर में कहा, "यह भूमि अब तुम्हें स्वीकार नहीं करेगी, युवराज। यदि जीवित रहना चाहते हो, तो तुम्हें उस मार्ग पर चलना होगा, जिसे तुम्हारी आत्मा अस्वीकार करती आई है।"
युवराज कांपते हुए बोला, "त...तुम क्या कहना चाहते हो?"
अघोरी मुस्कुराया, किंतु उसकी मुस्कान में एक भयावह रहस्य समाहित था। उसने अपनी अस्थि-मालाओं को छूकर एक मंत्र उच्चारित किया।
"ॐ कालभैरवाय नमः।"
क्षण भर में ही धरती पुनः काँप उठी। युवराज और ख्वाहिश को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनका शरीर किसी अदृश्य शक्ति द्वारा खींचा जा रहा हो। वायुमंडल में हाहाकार मच गया। वृक्षों की शाखाएँ टूटकर इधर-उधर बिखर गईं। आसमान काले बदल से आच्छादित हो गया।
और फिर...
वे दोनों एक गहरी गुफा में जा गिरे।
गुफा का रहस्य
चारों ओर घोर अंधकार था। केवल एक मद्धिम नीली ज्योति कहीं दूर झिलमिला रही थी। गुफा की दीवारों पर विचित्र आकृतियाँ उकेरी गई थीं—कुछ मानवीय, कुछ अमानवीय। उनके चेहरे विकृत थे, उनकी आँखें खोखली थीं।
युवराज ने दर्द से कराहते हुए स्वयं को संभाला। ख्वाहिश भी कठिनाई से खड़ी हुई।
"यह... यह स्थान क्या है?" ख्वाहिश की आवाज़ काँप रही थी।
युवराज कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक उनके चारों ओर से हँसी की भयावह गूँज उठी।
"हा... हा... हा..."
"तुम्हें लगता था कि तुम इस भूमि के स्वामी हो, युवराज?"
युवराज ने चारों ओर देखा। कुछ नहीं दिखा।
"तुम्हें लगता था कि प्रेम तुम्हें सब कुछ दिला सकता है, ख्वाहिश?"
अब ख्वाहिश ने भी भयभीत होकर इधर-उधर देखा। आवाज़ गूँज रही थी, लेकिन उसका स्रोत अज्ञात था।
अचानक, एक कंकाल-सा शरीर उनके सामने प्रकट हुआ। उसकी आँखों में एक शून्यता थी, जिसका कोई अंत नहीं था।
"हम वही हैं, जिन्हें मृत्यु ने ठुकरा दिया था। हम वही हैं, जिनकी आत्माएँ अनंत पीड़ा में फँसी हैं।"
और फिर...
उनकी संख्या बढ़ने लगी।
गुफा के हर कोने से असंख्य भूत प्रकट होने लगे। उनकी कंकाल-जैसी भुजाएँ युवराज और ख्वाहिश की ओर बढ़ने लगीं। उनकी आँखों में एक अदृश्य ज्वाला जल रही थी—एक ऐसी ज्वाला, जो मनुष्य के आत्मबल को भस्म करने के लिए पर्याप्त थी।
युवराज ने तलवार निकालनी चाही, किंतु उसकी उँगलियाँ जड़ हो गई थीं। ख्वाहिश ने भागने का प्रयास किया, किंतु उसके पैर किसी अदृश्य शक्ति ने जकड़ लिए थे।
"तुम इस गुफा से जीवित बाहर नहीं जा सकते!"
गूँजती हुई आवाज़ें उनकी चेतना को झकझोर रही थीं।
अघोरी का गुरु
और तभी, एक अंधेरे को चीरती हुई एक ज्वाला प्रकट हुई।
गुफा में एक और आकृति उभर आई। वह अघोरी नहीं था—वह उससे भी अधिक रहस्यमय, उससे भी अधिक शक्तिशाली प्रतीत हो रहा था।
वह एक वृद्ध था, जिसकी आँखों में ब्रह्मांडीय सत्य समाया हुआ था। उसके गले में रुद्राक्ष की माला थी, और उसके शरीर पर गेरुआ भस्म लगा हुआ था।
अघोरी ने शीश झुकाकर कहा, "गुरुदेव! अब निर्णय आपके हाथ में है।"
गुरु ने अपनी जटाओं को सीधा किया और युवराज की ओर देखा।
"अहंकार तुझे मारेगा, बालक। तूने प्रेम को भी अधिकार समझा। किंतु प्रेम अधिकार नहीं, त्याग है। यह भूत तेरे शरीर को नहीं, तेरी आत्मा को ग्रस रहे हैं, क्योंकि तेरी आत्मा अभी भी मोह और घमंड से ग्रसित है।"
युवराज ने कांपते हुए कहा, "मैंने कुछ भी गलत नहीं किया... मैंने केवल अपना प्रेम पाने का प्रयास किया।"
गुरु ने उसकी ओर तीक्ष्ण दृष्टि डाली।
"क्या तूने उससे पूछा था कि वह तेरा होना चाहती है या नहीं?"
युवराज का चेहरा फीका पड़ गया।
ख्वाहिश ने काँपते हुए कहा, "गुरुदेव, क्या इन आत्माओं से बचने का कोई मार्ग है?"
गुरु ने आँखें बंद कीं और एक गहरा मंत्र उच्चारित किया।
अचानक, गुफा की दीवारें काँपने लगीं।
भूतों की मंडली एक विचित्र चीख़ के साथ पीछे हटने लगी। उनकी आँखों में एक भय उमड़ पड़ा था।
गुरु ने अपनी हथेली उठाई और एक ज्वलंत चक्र उत्पन्न किया।
"यदि तुम मुक्त होना चाहते हो, तो प्रेम का त्याग करना होगा। मोह से ऊपर उठना होगा। अन्यथा, यह आत्माएँ तुम्हारा भक्षण कर लेंगी।"
युवराज के भीतर द्वंद्व चल रहा था।
वह ख्वाहिश को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन उसे यह भी अहसास हो रहा था कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उसके घमंड और उसकी जिद के कारण हो रहा था।
गुरु ने कहा, "अब तेरे पास केवल दो मार्ग हैं—त्याग या विनाश।"
युवराज ने ख्वाहिश की ओर देखा।
उसकी आँखों में अब प्रेम था, किंतु उसमें अधिकार नहीं था—बल्कि एक गहरी पीड़ा थी।
"ख्वाहिश... मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ।"
जैसे ही उसने यह शब्द कहे, गुफा का अंधकार टूटने लगा।
भूतों की चीख़ें बढ़ गईं, लेकिन वे अब शक्तिहीन हो रहे थे।
गुरु ने एक अंतिम मंत्र उच्चारित किया, और गुफा का द्वार स्वयं खुल गया।
युवराज और ख्वाहिश गिरते-पड़ते बाहर निकले।
गुरु ने पीछे मुड़कर देखा।
गुफा पुनः अंधकार में विलीन हो गई।
नियति का निर्णय
युवराज अब बदला हुआ व्यक्ति था।
ख्वाहिश अब स्वतंत्र थी।
और अघोरी?
वह अपने गुरु के चरणों में बैठा था।
गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, "मृत्यु कभी अंतिम सत्य नहीं होती, केवल अहंकार ही मरता है।"
युवराज ने गुरु के चरणों में सिर झुका दिया।
और इसी के साथ, वह एक नया मार्ग चुनने के लिए आगे बढ़ गया।
(समाप्त)
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