षष्ठ अध्याय: अघोरी की भविष्यवाणी और मृत्यु का द्वार
अंधकार घना हो चुका था। वृक्षों के पत्ते अनायास ही कांप रहे थे, जैसे किसी अदृश्य शक्ति की उपस्थिति को भांप चुके हों। युवराज की हथेलियाँ पसीने से भीग गई थीं, उसकी रीढ़ में एक भयावह सिहरन दौड़ रही थी। ख्वाहिश अब भी वहीं खड़ी थी, पर उसकी आँखों में अब डर से अधिक एक विचित्र शांति थी—जैसे वह किसी अनहोनी को पहले ही भाँप चुकी हो।
तभी...
हवा में अचानक एक अजीब-सी गंध घुल गई—चमड़े की जलती हुई गंध, रक्त के साथ घुली हुई राख की तीव्र गंध। यह गंध मन में एक गहरा भय उत्पन्न कर रही थी। युवराज ने अपने चारों ओर देखा, किंतु उस भयावह रात्रि में उसे कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा था।
फिर, दूर जंगल के एक कोने में एक धीमी, मगर स्पष्ट आवाज़ गूँजी—मंत्रों का जाप।
"ॐ काली कल्याणि महामाया, रक्षा-रक्षा महाक्रूराय..."
युवराज और ख्वाहिश दोनों ने उसी दिशा में देखा।
अंधकार में एक आकृति धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी।
वह एक मनुष्य था—या शायद मनुष्य जैसा दिखने वाला कोई और ही प्राणी।
उसका शरीर धूल और भस्म से सना हुआ था। बाल घने और बिखरे हुए, गले में खोपड़ियों की माला झूल रही थी। हाथ में एक त्रिशूल और कमर पर लाल-काले धागों से बंधी हड्डियाँ। उसकी आँखें—वो आँखें जो किसी और लोक का रहस्य समेटे हुए थीं—युवराज के भीतर तक उतर गईं।
वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक अघोरी था।
युवराज ने स्वयं को संयत करने का प्रयास किया।
"क..कौन हो तुम?" उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
अघोरी मुस्कुराया, लेकिन उसकी हँसी किसी जीवित व्यक्ति की हँसी जैसी नहीं थी—वह किसी मृतात्मा की हँसी थी, किसी ऐसे का अट्टहास, जिसने जीवन और मृत्यु दोनों को जीत लिया था।
"मैं वही हूँ, जिसे तुम्हारी तक़दीर ने यहाँ बुलाया है। मैं वही हूँ, जो उन आत्माओं की भाषा समझता है, जिन्हें तुमने अनदेखा किया है।"
युवराज को कुछ समझ नहीं आया।
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
अघोरी आगे बढ़ा, और अपनी सूखी, हड्डी-जैसी उँगलियाँ उठाकर ख्वाहिश की ओर इशारा किया।
"यह लड़की इस स्थान की नहीं है। इसे यहाँ से तुरंत ले जाओ।"
युवराज ने अट्टहास किया, "तू कौन होता है मुझे आदेश देने वाला?"
अघोरी का चेहरा कठोर हो गया।
"अहंकार मत कर, बालक! तूने जिस भूमि पर पाँव रखा है, वह साधारण नहीं है। यह मृत आत्माओं की भूमि है, और यहाँ केवल वे ही जीवित रहते हैं, जिन्हें मृत्यु स्वीकार कर ले।"
ख्वाहिश ने काँपते हुए पूछा, "तुम... तुम कहना क्या चाहते हो?"
अघोरी युवराज की ओर बढ़ा।
"क्या तुमने महसूस किया? वह हवा जो तुम्हारे चारों ओर घूम रही थी? वह आवाज़ जो तुम्हारे कानों में फुसफुसाई थी? वह शक्ति जो तुम्हें अंदर से तोड़ रही थी?"
युवराज ने कुछ नहीं कहा।
अघोरी झुककर ज़मीन पर बैठ गया, और अपनी उँगलियों से वहाँ की धूल उठाकर हवा में उड़ा दी।
अचानक, पूरी भूमि काँपने लगी।
युवराज भयभीत होकर पीछे हटा, लेकिन ख्वाहिश जड़वत खड़ी रही। उसके सामने ज़मीन पर धीरे-धीरे कुछ उभरने लगा—रक्त से लिखे हुए अक्षर।
"जो इस भूमि पर प्रेम की अग्नि लेकर आया, वह स्वयं उसी अग्नि में भस्म होगा।"
युवराज ने आँखें फाड़कर देखा।
"यह क्या बकवास है?"
अघोरी ने गहरी साँस ली और कहा, "तुमने जिसे पाने के लिए यह सब किया, वही तुम्हारे विनाश का कारण बनेगी। यह भूमि तुम्हें जीवित वापस नहीं जाने देगी। तुम्हारे भीतर जो असीम सत्ता का अभिमान है, वह यहाँ निष्फल होगा।"
युवराज अब गुस्से से कांपने लगा।
"मुझे डराने की कोशिश मत कर, तांत्रिक! मैं युवराज सिंहानिया हूँ! मैंने जो चाहा, वह पाया है। ख्वाहिश मेरी है, और रहेगी!"
अघोरी हँसा।
"तो फिर, इसे छूकर दिखाओ।"
युवराज ने ख्वाहिश की कलाई पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया—
पर जैसे ही उसकी उँगलियाँ ख्वाहिश की त्वचा को स्पर्श करने वाली थीं, एक ज़ोरदार झटका लगा।
युवराज उछलकर पीछे गिर पड़ा।
उसकी उंगलियों से धुआँ उठ रहा था, जैसे किसी अदृश्य अग्नि ने उसे जला दिया हो।
युवराज ने दर्द से चीख़ते हुए अपनी हथेलियाँ देखीं—उसकी उंगलियाँ लाल हो चुकी थीं, मानो किसी ने उन्हें दहकते कोयलों पर रख दिया हो।
ख्वाहिश भी स्तब्ध थी।
अघोरी की आँखों में अब एक भयावह चमक थी।
"मैंने कहा था, यह तुम्हारी नहीं है। इसे इस भूमि ने स्वीकार कर लिया है। अब यह प्रेम नहीं, यह बलिदान की लड़ाई है।"
युवराज ने दर्द से कराहते हुए कहा, "न...नहीं! यह मेरा अधिकार है!"
अघोरी ने धीरे से आँखें मूँद लीं और एक गहरा मंत्र उच्चारित किया।
और तभी...
चारों ओर से एक अजीब-सी गूँज उठी।
जैसे कोई अदृश्य ताकत युवराज को अपने अंदर खींच रही हो।
हवा ज़ोर-ज़ोर से बहने लगी, वृक्षों की शाखाएँ टूटकर इधर-उधर गिरने लगीं। गाड़ी के शीशे अचानक चटक गए, और युवराज को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसके पैर ज़मीन में धँस रहे हों।
"मुझे बचाओ!!" वह चीख़ा।
ख्वाहिश ने काँपते हुए अघोरी की ओर देखा।
"क्या...क्या यह मरेगा?"
अघोरी मुस्कुराया।
"मृत्यु और जीवन अब इस स्थान के हाथ में हैं। यदि यह जीवित बच भी गया, तो यह वही युवराज नहीं रहेगा, जो यहाँ आया था।"
युवराज की चीख़ें अब हवा में गूँज रही थीं।
क्या यह शक्ति उसे पूरी तरह समाप्त कर देगी?
या क्या नियति उसे जीवन का एक और अवसर देगी?
(क्रमशः...)
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